Thursday, January 01, 2026

शिवप्रसाद सिंह : नई कहानी के प्रवर्तक कथाकार

 शिवप्रसाद सिंह : नई कहानी के प्रवर्तक कथाकार

कहानी आधुनिक युग में गद्य-साहित्य का विकास है, किंतु इसके प्रमाण इससे पूर्वकाल में भी प्राप्त होते हैं। यूँ तो नई कहानी यानी समकालीन कहानी की शुरुआत सन ६० के बाद से मानी जाती है, जिसके प्रवर्तक कथाकार थे, डॉ० शिवप्रसाद सिंह। उनका जन्म १९ अगस्त १९२८ को बनारस के जलालपुर गाँव (उत्तर प्रदेश) में एक जमींदार परिवार में हुआ था। इनका जन्म कहीं-कहीं १९२९ भी दर्ज़ है। पर यह अप्रामाणिक है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय पाठशाला में हुई। उनके व्यक्तित्व के विकास में उनकी दादी, पिता और माँ का विशेष योगदान रहा। उन्होंने १९४९ ई० में उदयप्रताप कॉलेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण कर १९५१ में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। वहीं से एमए (हिंदी) करने के उपरांत आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निर्देशन में 'सूर पूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य' विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। १९५६ से वे वहीं प्राध्यापक रहे। १९८८ में अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त होने के बाद डॉ० सिंह ‘प्रोफेसर एमेरिटस’ भी रहे। वे छठे दशक के उन विशिष्ट रचनाकारों में थे जिनकी रचनाओं में भारतीय चित्र तथा गहरी संवेदना और समकालीन यथार्थ के द्वंद्व का सूक्ष्म एवं कलात्मक रूपांकन हुआ है।

उन्होंने साहित्य की विविध विधाओं - उपन्यास, कहानी, निबंध, नाटक, रिपोर्ताज़, आलोचना में महत्वपूर्ण सृजन किया। किंतु उनकी प्रतिभा एक कथाशिल्पी के रूप में विशिष्ट कही जा सकती है। उन्होंने अपनी कहानियों में आंचलिकता के जो प्रयोग किए, वे प्रेमचंद और फणीश्वरनाथ रेणु से पृथक थे। पृथक्करण की यह अद्वितीयता उन्हें हिंदी कथा-साहित्य में एक नए, उर्वर 'प्लेटफार्म' पर प्रतिष्ठित करती है। वे एक बौद्धिक साहित्यकार थे। उनकी अद्भुत बौद्धिकता, तार्किकता और विलक्षण प्रज्ञा-प्रतिभा ने हिंदी साहित्य को आंदोलित किया। उनके जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आए। परिस्थितियाँ विद्रूप हुईं पर वे अपने अप्रतिम धैर्य और हिम्मत से उनका मुकाबला करते रहे। लेकिन बेटी की आकस्मिक मौत ने साहित्य के महाबली को तोड़ दिया। 

साहित्य और दर्शन के विशिष्ट विद्यार्थी डॉ० शिवप्रसाद सिंह ने शीर्षस्थ कथाशिल्पी होने के साथ ही अनुशीलन, संपादन, चिंतन और निबंध लेखन के क्षेत्र में अपनी पृथक पहचान बनाई। उपन्यास सृजन की कलात्मकता ने उन्हें अतिरिक्त सम्मान दिया। उनकी कहानियों और उपन्यासों में समकालीन समाज का यथार्थ बिंब दिखाई देता है। ‘आर-पार की माला’, ‘कर्मनाशा की हार’, ‘शाखामृग’, ‘इन्हें भी इंतजार है’, ‘मुर्दा सराय’ उनके बहुचर्चित कहानी-संग्रह हैं, तो 'अलग-अलग वैतरणी' 'गली आगे मुड़ती है', 'नीला चाँद' और 'वैश्वानर' प्रसिद्ध कथात्मक कृतियाँ हैं। डॉ० नामवर सिंह का यह कहना है कि “शिवप्रसाद सिंह को उपन्यास लिखने की प्रेरणा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘चारुचन्द्र’ से मिली”, पर इससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। इन कृतियों ने उनके विरल व्यक्तित्व को विशेष ऊँचाई दी। उनकी 'कर्मनाशा की हार' और ‘गली आगे मुड़ती है’ और ‘नीला चाँद’ कृतियाँ प्रकाशित हो आलोचना से रूबरू हुईं थी। 'गली आगे मुड़ती है' उपन्यास भी स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के टूटते हुए गाँव की कहानी है। टूटते गाँव में अभी भी कुछ टूटने को बाकी है। वास्तव में यह टूटना जड़ता और अज्ञानता का टूटना नहीं है, मूल्यों और संबंधों का टूटना है, विवेक और संवेदनाओं का टूटना है। साथ ही साथ ज़मींदारी और जाति-पाँति का भी टूटना है किंतु यह कितनी बड़ी विडंबना है कि बुरी चीजें टूटकर भी नहीं टूटी और अच्छी चीजें टूटने लगीं तो फिर टूटती ही गईं। गाँव में वही जड़ता, अंधविश्वास, विवेकहीन, स्वार्थांध, सामान्य लोगों की अधकचरी सोच बरकरार है। 

'कर्मनाशा की हार' कहानी का कथ्य कुछ इस प्रकार है, “काले सांप का काटा आदमी बच सकता है, हलाहल पीने वाले की मौत रुक सकती है, किंतु जिस पौधे को एकबार कर्मनाशा का पानी छू ले, वह फिर हरा नहीं हो सकता। कर्मनाशा के बारे में किनारे के लोगों में एक और विश्वास प्रचलित था कि यदि एकबार नदी बढ़ आए तो बिना मानुस की बलि लिए लौटती नहीं। हालाँकि थोड़ी ऊँचाई पर बसे वालों को इसका कोई खौफ़ न था, इसी से बाढ़ के दिनों में, गेरू की फैले हुए अपार जल को देखकर खुशियाँ मनाते, दो-चार दिन की यह बाढ़ उनके लिए तब्दीली बनकर आती।” उन्होंने अपनी कहानियों को ग्रामोन्मुखी बनाकर सामाजिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य करते हुए अनेक अंतर्विरोधों को उकेरा है और अंधविश्वासों पर गहरी चोट की है। दरअसल नई कहानी की चेतना परिवेश से जुड़े हुए व्यक्ति-मन की चेतना है। इसीलिए न तो वह बाह्य यथार्थ की अनुभूतिहीन फार्मूला कथा कहती है न बाहरी परिवेश से विच्छिन्न होकर या बाहरी परिवेश को केवल अचेतन की दुनिया से संदर्भित कर मात्र व्यक्ति-मन का चित्रण करती है। गाँव के संबंध में शिवप्रसाद सिंह की बहुत महत्त्वपूर्ण और जटिल संवेदना वाली मार्मिक कहानी है, 'नन्हों'। यह कहानी ग्राम-परिवेश के अनेक रंगों और गंधों को अपने में समेटे हुए है। इसी तरह 'राग गूजरी' और 'भेदिए' कहानियाँ भी गँवई जन-संवेदना की उत्कृष्ट कहानियाँ हैं। उनकी पहली कहानी 'दादी माँ' थी, जिससे हिंदी कहानी को एक नया आयाम मिला। इसका प्रकाशन १९५१ में 'पहल' प्रत्रिका में हुआ था। उनके उपन्यास में भी अंचलीय संस्पर्श और रंग साफ दिखाई देता है। 


काशी के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के दर्शन उनके 'गली आगे मुड़ती है' और 'नीला चाँद' और 

‘वैश्वानर’ में बिंबित होता है। 'नीला चाँद' इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। इसमें मध्यकालीन काशी का विस्तृत फलक है। यह न धर्मोपदेश है, न अख़बार का पन्ना। यह नई सदी की दहलीज़ पर पैर रखने वाले मानव जीवन का सच है। बड़े विस्तृत फलक पर कथा का सृजन नएपन के साथ औपन्यासिक नई दृष्टि लिए है। इनमें जन-चेतना उन्हें प्रेमचंद से जोड़ते हुए भी कथ्य और शिल्प के संबद्ध में नवीनता पृथक करती है। वे परंपरा से पृथक दिखते हैं। अपने स्वरूप और दृष्टि में भिन्न हैं। उनकी रचनाओं में उनके व्यक्तित्व की झलक मिलती है। कहते हैं, 'वैश्वानर' उपन्यास पर कार्य करने से पूर्व उन्होंने संपूर्ण वैदिक वांग्मय को खंगाला डाला।

शिवप्रसाद जी ने विचार-प्रधान निबंधों के साथ ही रम्य-मुद्रा में व्यक्ति-व्यंजक निबंध लिखे हैं। उनके निबंधों में धरती-राग और वैदुष्य की आभा सहज रूप से दृष्टिगत होती है। अपने गाँव और अपने नगर काशी से संपृक्त निबंधकार डॉ० सिंह ने हल्के-फुल्के प्रसंगों के माध्यम से भारतीय संस्कृति के ज्वलंत सवालों को स्पर्श किया है। उनके निबंधों में जो उत्कृष्टता के गुण से परिपूर्ण लालित्य हैं, वह प्रभावपूर्ण हैं। 'आधुनिक परिवेश और अस्तित्ववाद' निबंध स्थायी महत्व लिए पुनः पुनः पठनीय है। जिसमें उन्होंने अस्तित्ववाद के संदर्भ में पश्चिमी प्रभाववाद और यांत्रिक भौतिकवाद के अन्योन्याश्रित संबंधों को उद्घाटित तो किया ही है, अस्तित्ववाद के सिद्धांतों पर भी गहन प्रकाश डाला है जो नए चिंतन को जन्म देता है।

शिवप्रसाद सिंह ने यात्रा-वृत्तांत, संस्मरण और डायरी आदि विधाओं में भी लिखा है। उनके संस्मरण रेखाचित्र से अति रोचक हैं, जिनमें उन्होंने अपनी अतीत और समसामयिक स्मृतियों को संजोया है। डायरी के माध्यम से लेखक ने स्फूर्त भावों और विचारों को अभिव्यक्त किया है, तो जीवनी में अपनी माँ और पारिवारिक स्थितियों-परिस्थियों और उनके मनोभावों को मनोवैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया है। उसके अंश देखें, “किशन भैया की शादी ठीक हुई, दादी माँ के उत्साह पड़ोसिनें आतीं, हुक्का चढ़ता। बहुत बुलाने पर दादी माँ आतीं, बहिन बुरा न मानना। कार-परोजन का घर ठहरा। एक काम अपने हाथ से न करूँ, तो होने वाला नहीं।"

अस्तित्ववादी दर्शन और अरविंद-दर्शन पर केंद्रित उनकी पुस्तकें हिंदी में अद्वितीय अवदान के रूप में समादृत हैं। प्रत्येक विधा में उनका सृजक व्यक्तित्व प्रधान रहा है। अतः डॉ० शिवप्रसाद सिंह आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की सारस्वत परंपरा के वारिस सिद्ध होते हैं। उनकी भाषिक संरचना सरल-सहज किंतु प्रगल्भ है। नई अनुभूति और नए विचारों का अन्वेषण उनका अतिरिक्त वैशिष्ट्य है। चूँकि वे एक ख्याति प्राप्त आलोचक भी रहें हैं, अतः उनकी कथात्मक कृतियों और आलोचना की भाषा में बारीक अंतर है। पश्चिम की मान्यता से पृथक उन्होंने कुछ अनुभव जन्य आलोचनाएँ भी लिखी हैं। उसमें बौद्धिकता, तर्क और वैज्ञानिकता ही नहीं, अपितु शिल्प और भाषा के स्तर पर कलात्मकता भी हैं। उनके सृजन में कहीं वस्तु-तत्त्व का प्राधान्य है, तो कहीं कला-पक्ष का। परंतु संपूर्ण सृजन भाषिक संरचना की दृष्टि से सरल- सुगम मौलिक प्रतिभादर्श लिए है। उनकी भाषा परिशिष्ट खड़ीबोली है। यत्र-तत्र भोजपुरी के साथ देशज शब्द की प्रयोगधर्मिता और कहावतों-मुहावरों का छौंक जायकेदार लगता है। अतः उनके साहित्य का वाचन करना गंगा में अवगाहन करने जैसी अनुभूति कराता है।

शिवप्रसाद सिंह : जीवन परिचय

जन्म- १९ अगस्त १९२८, जलालपुर, बनारस, उत्तर प्रदेश
निधन- २८ सितंबर १९९८
शिक्षा- एमए (हिंदी), पीएचडी (हिंदी) 
कार्यक्षेत्र - प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, काशी हिंदू विश्वविद्यालय
साहित्यिक रचनाएँ- 
कहानी संग्रह
आर-पार की माला
कर्मनाशा की हार
शाखामृग
इन्हें भी इंतजार है
मुर्दा सराय
धतुरे का फूल
कोहरे में युद्ध
राग गुजरी
भेदिए
एक यात्रा सतह के नीचे
नन्हों
उपन्यास
अलग-अलग वैतरणी
गली आगे मुड़ती है
नीला चाँद 
शैलूष
हनोज
दिल्ली दूर है
औरत 
वैश्वानर
मंजुषिमा



निबंध संग्रह
शिखरों के सेतु
कस्तूरी मृग
चतुर्दिक
रिपोर्ताज़
अन्तरिक्ष के मेहमान
नाटक
घाटियाँ गूंजती हैं
आलोचना
विद्यापति
कीर्तिलता और अवश्य भाषा 
आधुनिक परिवेश और नवलेखन
आधुनिक परिवेश और अस्तित्ववाद


जीवनी

उत्तरयोगी श्री अरविंद

संपादन

शांतिनिकेतन से शिवालिक तक

सम्मान

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा संस्थान सम्मान

साहित्य अकादमी पुरस्कार

के० के० बिरला फाउंडेशन द्वारा 'व्यास सम्मान'

शारदा सम्मान



संदर्भ

विकिपीडिया 

भारतकोश/भारत डिस्कवरी

रामदरश मिश्र रचनावली (आलोचना) खंड-१४, प्रथम संस्करण २०००

बीसवीं सदी : हिंदी के मानक निबंध (खंड २) संपादक डॉ० राहुल, भावना प्रकाशन दिल्ली।

साहित्यकार निर्देशिका, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ (१९९१)।

हिंदी साहित्य : युग और प्रवृत्तियाँ, डॉ० शिवकुमार शर्मा, अशोक प्रकाशन, दिल्ली - ०६।



वाजिद अली शाह

 नवाब वाज़िद अली शाह : हज़ार रातें भी गुज़री यही कहानी हो... 

स्वरांगी साने

“बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए...चार कहार मिल मोरी डोलिया सजावें, मोरा अपना बेगाना छूटो जाए। बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए… आँगन तो पर्वत भयो और देहरी भयी बिदेस, जाये बाबुल घर आपनो मैं चली पिया के देस, बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए…”

जब नवाब वाज़िद अली शाह को लखनऊ छोड़ना पड़ा तो उन्होंने उस दर्द को ठुमरी की इन पंक्तियों में उकेरा था। इसके साथ एक कथा ऐसी है कि सत्तावन की लड़ाई में वे जूतियाँ नहीं पहन पाए और भागने में असफल रहे जिससे अंग्रेज़ों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था, पर इतिहासकार इसे झुठलाते हुए सबूत देते हैं कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने ४ फरवरी १८५६ को ही वाज़िद अली शाह से अवध की सत्ता अपने कब्ज़े में ले ली थी। वाज़िद अली शाह को सन १८५६ में ही कलकत्ता भेज दिया गया था। जब सन १८५७ का गदर हुआ तब वे मटियाबुर्ज में थे। जहाँ ऐहतियातन उन्हें नज़रबंद कर दिया गया था। उनके भाग पाने की कोई गुंजाइश थी ही नहीं। अपनी मिट्टी से दूर जाने की कसक उनके भीतर गहरी थी जो उनके मशहूर अशरार में उभरी है, “दर-ओ-दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं, ख़ुश रहो अहल-ए-वतन, हम तो सफ़र करते हैं।”



वे लिखते हैं “न ठंडी साँसें भरो दौर-ए-मय में हम नफ़साँ, ये आग भड़केगी मय-ख़ाने में हवा न करो”, लेकिन यह भी हैरतअंगेज़ है कि नवाब ने कभी शराब को छुआ न था। ‘पिया वाज़िद अली’ नाम से कई बंदिशों के इस रचियता को साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में ख़ासकर कथक नृत्य की दुनिया में कथक के प्रश्रयदाता के रूप में जाना जाता है। ‘नैहर छूटो जाए’ ठुमरी को प्रचलित करने में के० एल० सहगल की आवाज़ का बड़ा योगदान है, जिन्होंने लोक में इसे दुल्हन के विदाई गीत की तरह लोकप्रिय किया। कथक के कई नामी बड़े नर्तकों ने इसे मृत्यु के बाद देह के छोड़े जाने से जोड़ा है, और चार कहारों को अंतिम बेला में कंधा देने वाले चार लोग बताया है। 

अवध के शासक वाज़िद अली शाह को विरासत में कमज़ोर राज्य मिला था। उन्होंने उस कमज़ोर राज्य को सशक्त बनाने के लिए हिंदुस्तानी तहज़ीब को तवज्जो दी। इतिहास में दर्ज है कि हिंदू त्योहारों में वे खुद शामिल होते थे। उनकी प्रसिद्ध ठुमरी भी है, ”मोरे कान्हा जो आए पलट के, अब के होली मैं खेलूँगी डट के…”



सन १७६३-६४ में बक्सर के पास हुई लड़ाई में नवाब शुज़ा उद दौला ईस्ट इंडिया कंपनी से हार गया था और उसने अंग्रेज़ों को अवध का शासन नियंत्रित करने का अधिकार दे दिया था। उसके बाद सन १८५६ तक का अवध का इतिहास ब्रिटिशों के कुटिल षड़यंत्रों, अत्याचार और लालच के अंधे युग का इतिहास है। ब्रिटिश पार्लियामेंट के सामने अवध की जनता की दरख़्वास्त को The Dacoitee in Excelsis or The Spoliation of Oude, Faithfully Recounted किताब के ज़रिए अंग्रेज जनता को उस वक्त उपलब्ध करा दिया गया था। महारानी विक्टोरिया ने १ नवंबर १८५८ को हिंदुस्तान को अपने हाथ में ले लिया था, लेकिन अवध को बाग़ियों से खाली कराने में ७ जनवरी १८५९ तक का समय लगा।



इंग्लैंड की रानी को अपना परिचय देते वक्त अवध के इस नवाब ने रामायण और राम से प्रारंभ किया था। अवध की राजमाता ज़ैनबी औलिया ताज़रा बेगम लंदन में अपने अधिकार और स्वतंत्रता की गुहार लगा रही थी, उसी समय भारत में आज़ादी की सन १८५७ की लड़ाई में अवध की एक और बेगम नवाब वाज़िद अली की दूसरी पत्नी बेगम हज़रत महल नानासाहेब पेशवा, तात्या टोपे के साथ कंधे से कंधे मिला लड़ रही थीं। वाज़िद अली शाह की गैर मौजूदगी में बेगम हज़रत महल मौलवी अहमद शाह और तमाम 'नाचने-गाने वालों' ने फिरंगी फौजों को शहर में घुसने नहीं दिया।

 

लखनऊ की जिस इमारत में आज भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय है, उसे वाज़िद अली शाह के समय परीखाना कहते थे। उस इमारत में शाह की परियाँ रहती थीं। परी मतलब वह, जो नवाब को पसंद आ जाती थी। इनमें से अगर कोई बाँदी नवाब के बच्चे की माँ बन जाती तो उसे महल कहा जाता। बेग़म हज़रत महल के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने बाँदी से बेगम होने का सफ़र महल के रास्ते ही तय किया था। 

उन्हें विलासी नवाब के रूप में दिखाने वालों का अपना नज़रिया है, जो उन्हें ३०० शादियाँ करने वाला कह रंगीला नवाब कहता है। वाज़िद अली शाह की चर्चित किताब 'इश्कनामा' में उन्होंने आठ साल की उम्र में रहीमन नामक अधेड़ आयु की महिला से अपने जिस्मानी संबंध के बारे में लिखा है। इसमें ज़िक्र है कि परीखाना में १८० से ज्यादा महिलाओं को संगीत सिखाने के लिए नौकरी पर रखा गया था। उनके अनुसार “पड़ा है पाँव में अब सिलसिला मोहब्बत का, बुरा हमारा हुआ हो, भला मोहब्बत का।” कथक करते हुए नवाब खुद कृष्ण बनते थे और उनकी परियाँ, गोपियाँ। 



वैसे तो वाज़िद अली शाह ने कुल ६० किताबें लिखी थीं लेकिन उनमें से अधिकांश इतिहास की गर्द में खो गई हैं। अवध के नवाबख़ाने के भी बड़े शौकीन कहलाते थे तो वाज़िद अली शाह उससे अछूते कैसे रह सकते थे। वे रसोई के जानकार भर नहीं थे। तो नए प्रयोग करने का भी हुनर रखते थे, जैसे कलकत्ता बिरयानी में आलू का इस्तेमाल उन्होंने ही शुरू किया था। उन्हें उनके तरीकों की वजह से याद रखा जाए इसलिए वे अपने कुर्ते का बायाँ हिस्सा अधखुला छोड़ा करते थे और ऐसी उनकी कई तस्वीरें भी दिख जाएँगी।



ऊपरी तौर पर देखने पर नवाब वाज़िद अली को विलासी और शान-शौकत से जीने वाला माना जा सकता है, लेकिन गहरे पैठने पर वे बहुत संवेदनशील और भावुक हृदय के कलानुरागी शासक नज़र आते हैं। उनकी संवेदनशीलता को दिखाता यह शे’र देखिए, “ऐ नसीम-ए-सहरी हम तो हवा होते हैं, दम जो घुटता है मोहब्बत में ख़फ़ा होते हैं”। मुहब्बत उनके ज़ेहन में आठ साल की उम्र से थी, लेकिन उसी उम्र में वे कथक गुरु महाराज ठाकुर प्रसाद के शिष्य बन गए थे, इसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। दुनिया उन्हें समझ नहीं पाई इसका कोई मलाल उन्हें नहीं था। वे जानते थे और कहते थे, ‘सुन रक्खो उसे दिल का लगाना नहीं अच्छा, दुनिया ये बुरी है, ये ज़माना अच्छा नहीं’।



कथक शैली के तीनों नटन भेदों- नाट्य, नृत्त व नृत्य को फिर से समृद्ध करने के लिए उन्होंने गायक-वादक एवं नर्तक-नर्तकियों के बड़े समूह को अपने यहाँ ऊँचा वेतन देकर रखा था, लेकिन देखने वालों ने इसमें भी स्याह रंग ही देखा कि उन्होंने अरब व्यापारियों की अफ्रीकी गुलाम औरतों से शादी की थी। नवाब ने लगभग ११२ मुताह किए थे मतलब कुछ समय के लिए की जाने वाली शादी, तो कई निकाह किए थे और उतने ही तलाक भी दिए थे। तलाक की वजह बढ़ते खर्चे बताए जाते हैं लेकिन एक बात और थी वह थी उनका कला के प्रति समर्पण। कथक के प्रयोगों में गतिरोध पैदा करने वाली किसी भी बेगम को वे तुरंत छोड़ देते थे। उनके ही शब्दों में- ‘नज़दीक भी जाकर न मिला पर्दा-नशीं से, जा दूर हो ऐ दिल, तुझे चाहत नहीं आती।’ 



कला के प्रति इतनी निष्ठा कितने लोग निभा पाते हैं? नवाब वाज़िद अली शाह अपने कलाकारों को खुद प्रशिक्षण देते थे। कथक शैली के नाट्य तत्व की सर्वोत्कृष्ट प्रस्तुति वाज़िद अली शाह के भव्य रंग प्रयोग ‘रहस’ में दिखती है, जो रासलीला से प्रेरित था। तब तक कथक को दरबारी नृत्य कहा जाने लगा था, लेकिन उन्होंने रहस की रंग योजना, मंच, दृश्य सज्जा, पात्रों का मंच प्रवेश, कथावस्तु आदि के साथ नृत्य में नाट्य सम्मिलित किया था। लाखों रुपए खर्च कर रहस निर्मित होता था, जिसे कैसरबाग रहस मंज़िल में प्रदर्शित किया जाता था। नवाब साहब ने ‘अख़्तर’ उपनाम से कई ठुमरियाँ रची हैं और ‘कैसर’ नाम से भी। ‘अख़्तर’ से एक कलाम देखिए,

“ग़ुँचा-ए-दिल खिले जो चाहो तुम

गुलशन-ए-दहर में सबा हो तुम

बे-मुरव्वत हो बे-वफ़ा हो तुम

अपने मतलब के आश्ना हो तुम

कौन हो क्या हो क्या तुम्हें लिक्खें

आदमी हो परी हो क्या हो तुम


पिस्ता-ए-लब से हम को क़ुव्वत दो

दिल-ए-बीमार की दवा हो तुम

हम को हासिल किसी की उल्फ़त से

मतलब-ए-दिल हो मुद्दआ हो तुम

यही आशिक़ का पास करते हैं

क्यूँ जी क्यूँ दर-प-ए-जफ़ा हो तुम

उसी अख़्तर के तुम हुए माशूक़

हँसो बोलो उसी को चाहो तुम”



‘रहस’ केवल शाही परिवारों के सामने मंचित किया जाता था और आम लोगों के लिए सैयद आगा हसन ‘अमानत’ लिखित ‘इन्दर सभा’ को प्रस्तुत किया। कई बंदिशों जैसे ‘दरिया-ए-ताशक़’, ‘अफ़साने-ए-इस्बाक़’ और ‘बहार-ए-उल्फ़त’ को उन्होंने नाट्य रूप दिया।



नवाब ने अपनी बन्नी पुस्तक में कथक के नृत्य अंग की २१ गतों का वर्णन किया है। गतों का विकास करने के साथ उन्होंने ठुमरी भाव के विकास में भी बहुत योगदान दिया। ठुमरी भाव को नवाब वाज़िद अली शाह और महाराज बिन्दादीन ने नई पैहरन दी। तमाम बादशाहों और नवाबों की परंपरा में सबसे बड़े गुणग्राही और कला के कद्रदान के रूप में उनकी पहचान को ठुकराया नहीं जा सकता। ठुमरी और कथक के प्रति लखनऊ का झुकाव वाज़िद अली शाह के प्रोत्साहन से और भी बढ़ गया। उनके अंतर्पुर से लेकर राजदरबार तक कथक नृत्य और ठुमरी गान को प्रधानता दी जाने लगी थी। तत्कालीन लखनऊ का सारा वातावरण ठुमरी और कथक रंग में रंग गया था। उन्होंने शास्त्रीय संगीत के कई रागों की रचना की जैसे जोगी, जूही, शाह पसंद। सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में वाज़िद अली शाह का नृत्य और संगीत के संरक्षक के रूप को ही दर्शाया गया है। 



उन्होंने “उल्फ़त ने तिरी हम को तो रक्खा न कहीं का, दरिया का न जंगल का समा का न ज़मीं का” लिखते हुए ग़जलों की पनाह ली। शायद इसी अभिरुचि के कारण उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब को सन १८५४ में प्रति वर्ष पाँच सौ रुपए की पेंशन देना शुरू किया था। उनका फ़ारसी और उर्दू पर समान अधिकार था। पश्चिमी शिक्षा से वे दीक्षित थे और प्राचीन तथा आधुनिक इतिहास तथा साहित्य में निष्णात। तब भी उनकी लेखनी में उन्होंने अपना पांडित्य नहीं तो सरल अवधी बोली को अपनाया। निर्वासन काल में हुगली नदी के किनारे मटिया बुर्ज़ (मिट्टी के गुंबद) पर भी उन्होंने अपनी प्रति वर्ष की १२ लाख रुपए आय का बड़ा हिस्सा खर्च कर उसे लखनऊ बनाने की कोशिश की, ताकि प्रिय शहर और उससे जुड़ी यादें ताज़ा रह सकें। 

लखनऊ उनके ज़ेहन में इस कदर था कि ‘अल्लाह ऐ बुतो हमें दिखलाए लखनऊ, सोते में भी ये कहते हैं हम हाय लखनऊ!’

और अंत में, उनके लिखे शब्दों में कहें तो, “हज़ार रातें भी गुज़री यही कहानी हो, तमाम कीजिए इसको न कुछ सिवा कहिए…”

 

वाज़िद अली शाह : जीवन परिचय

पूरा नाम

अबुल मंसूर मिर्ज़ा मुहम्मद वाज़िद अली शाह

जन्म

३० जुलाई १८२२, लखनऊ

निधन

१ सितंबर १८८७, मटियाबुर्ज, कोलकाता में

पिता

अमज़द अली शाह

पुत्र

बिरज़िस कद्र

शासन

१३ फरवरी १८४७ से ११ फरवरी १८५६

शाही ख़िताब

मिर्ज़ा

प्रमुख कृतियाँ


इश्कनामा

नाज़ो

बन्नी

दीवान-ए-अख़्तर

हुस्न-ए-अख़्तर


दोहे

सावत-उल-कलूब के १०६१ पृष्ठों में ४४,५६२ दोहों का संग्रह शामिल है, जिसे तीन साल की अवधि में पूरा किया गया था।

आत्मकथात्मक हुज़्न-ए-अख्तर जिसमें लगभग १२७६ दोहे हैं।




संदर्भ

विकिपीडिया

अयोध्या (मूल मराठी पुस्तक) – लेखक माधव भंडारी, हिंदी संपादन (लेखिका स्वयं)

कथक नृत्य शिक्षा, द्वितीय भाग - लेखक डॉ० पुरु दाधीच


स्वरांगी साने








पूर्व वरिष्ठ उप संपादक, लोकमत समाचार,पुणे। 

भारतीय कौंसलावास, न्यूयॉर्क की वेबसाइट पर पत्रिका अनन्य के लिए संपादन सहयोग। 

जनसत्ता, नई दिल्ली तथा वेब दुनिया हेतु नियमित स्तंभ लेखन, स्वतंत्र अनुवादक-लेखक, कवयित्री।

भारत सरकार द्वारा विकसित वेब इंटरफ़ेस के लिए लगातार अनुवाद। 

एम. ए. (कथक) (स्वर्णपदक), कथक विशारद (Distinction), अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय मंडल, मिरज (मुंबई) 

काव्य संग्रह “शहर की छोटी-सी छत पर” और “वह हँसती बहुत है” यू-ट्यूब पर चैनल: #AMelodiousLyricalJourney 

कार्यक्षेत्र : कविता, कथा, अनुवाद,संचालन, स्तंभ लेखन, पत्रकारिता,अभिनय, नृत्य, साहित्य-संस्कृति-कला समीक्षा, आकाशवाणी और दूरदर्शन पर वार्ता और काव्यपाठ


नंदकिशोर आचार्य: मानवजीवन की ध्वनियाँ साहित्य तक लानेवाले

  


कविता, नाटक, आलोचना, संस्कृति, कला, सभ्यता, अनुवाद, सम्पादन, चिंतन, विचार और मानवता का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिस पर नंदकिशोर आचार्य ने काम न किया हो। इन्होंने कई विधाओं में लिखा है; मुख्यतः ये एक कवि के रूप में जाने जाते हैं। अज्ञेय द्वारा सम्पादित ‘चौथा तार सप्तक’ के कवि रहे हैं। इसमें सर्वाधिक ३१ कविताएँ नंदकिशोर की हैं। 

इनका जन्म ३१ अगस्त, १९४५ में बीकानेर, राजस्थान में हुआ था। इन्होंने अँग्रेज़ी साहित्य और इतिहास में उच्च शिक्षा प्राप्त की है और इतिहास में पीएचडी की है। 

जिस निम्न मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवार में इनका जन्म हुआ था, उसमें कर्म से कोई ब्राह्मण नहीं था। इनके पिता का पालन-पोषण उनसे उम्र में १९-२० वर्ष बड़े भाई ने किया था, क्योंकि उन दोनों के पिता की अकस्मात् मृत्यु हो गयी थी। इसलिए घर में ताऊ जी का बहुत आदर-सम्मान था। नंदकिशोर के पिता की पान की दुकान थी। वे बालक नंदकिशोर को चौथी कक्षा के बाद अपनी दुकान पर बैठाना चाहते थे लेकिन नंदकिशोर को यह मंज़ूर नहीं था। नंदकिशोर ने अपनी पढ़ाई रुकने की बात जब ताऊजी को बताई तो उन्होंने उसकी पढ़ाई तथा अन्य सभी ख़र्चे हमेशा के लिए अपने ऊपर ले लिए। नंदकिशोर कहते हैं कि आज वे जो कुछ-भी हैं, ताऊजी की बदौलत हैं। इनके घर में या घर के आस-पास साहित्यिक माहौल बिलकुल नहीं था, लेकिन ननिहाल में धार्मिक किताबें बहुत पढ़ी जाती थीं। नानाजी को कथाएँ पढ़कर सुनाते-सुनाते इनकी गंभीर साहित्य पढ़ने में गहरी रुचि हो गई और रोज़ कुछ-न-कुछ नया पढ़ना आदत बन गई। इसके अलावा बचपन से ही तुकबंदी करने की आदत थी। छठी-सातवीं कक्षा में पहली कविता लिखी; ‘जावेद नदीम’ उपनाम से कुछ ग़ज़लें भी लिखीं। इन्हें उर्दू लिपि नहीं आती थी, इसलिए देवनागरी में ही लिखा। हिंदी, बांग्ला और उर्दू साहित्य ख़ूब पढ़ा, विशेषकर अज्ञेय को। नवीं-दसवीं कक्षा में ‘शेखर एक जीवनी पढ़ी’, जिसका इनके व्यक्तित्व पर गहरा असर पड़ा था। बीकानेर में ही रहने वाले हिंदी और राजस्थानी के कवि हरीश भादानी के साथ इनका उठना-बैठना होता था। नंदकिशोर अज्ञेय से बहुत प्रभावित थे। आचार्य जी की कविताओं पर ग़ालिब की ग़ज़लों का भी असर है। गंभीर लेखन की शुरूआत वर्ष १९६६-१९६७ में एमए के दौरान ऐसे हुई थी - बीकानेर के ही एक लेखक राजा नल भटनागर ने मित्र-मंडली में नंदकिशोर को अज्ञेय पर बोलते हुए सुना था। भटनागर ने अपने प्रकाशक से नंदकिशोर से अज्ञेय की कविताओं पर एक आलोचनात्मक पुस्तक लिखवाने का आग्रह किया। इसके लिए नंदकिशोर ने पहले तो मना कर दिया लेकिन फिर प्रकाशक के आग्रह और दबाव से ‘अज्ञेय की काव्यतितीर्षा’ लिखी। इसमें इन्होंने एक मुख्य बात यह कही है कि काव्य की समालोचना पहले से बने बनाये ढ़ाँचे पर न करके उस काव्य के प्रमाण-आधार पर की जानी चाहिए। यह पुस्तक अज्ञेय पर लिखी गयीं पहली दो-तीन पुस्तकों में से एक है। यह इनके लेखन के शुरूआती दौर की किताब होने के बावजूद अज्ञेय के समूचे काव्य पर एक बेहतरीन रचना मानी जाती है। इसके लिए इन्हें समग्र दृष्टि के आलोचक के रूप में ख्याति प्राप्त हुई। आचार्य जी इस रचना के लिए भटनागर और उनके प्रकाशक के प्रति बहुत आभारी हैं। 

इनके कुछ प्रमुख काव्य संग्रह हैं - ‘जल है जहाँ’, ‘शब्द भूले हुए’, ‘वह एक समुद्र था’, ‘आती है जैसे मृत्यु’, ‘कविता में नहीं है जो’ आदि। ‘छीलते हुए अपने को’ कविता संग्रह के लिए पिछले वर्ष इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 

आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि प्रेम एक प्रकार का समर्पण माँगता है। नंदकिशोर के विचार से प्रेम मनुष्य को बाँधता नहीं है, उसे स्वतंत्र करता है, उसके व्यक्तित्व को और पुष्ट करता है। अगर ऐसा नहीं है तो कहीं न कहीं नियंत्रण होता है और नियंत्रण स्वतंत्रता पर आघात करता है। प्रेम की अभिव्यक्ति पर एमए के दिनों में लिखी उनकी एक प्रारंभिक कविता है - बाँसुरी और मोरपंख 



बुरा तो नहीं मानोगे

यदि मुझे अब

तुम्हारी बाँसुरी बने रहना

स्वीकार नहीं।


यह नहीं कि मैं उपेक्षित हुआ

बल्कि अधरों पर तुम्हारे सदा

सज्जित रहा,

किन्तु मेरा कब रहा संगीत वह

जो मेरे ही रन्ध्र-रन्ध्र से बहा ?


मुझे से तो अच्छी रही

वह मोरपाँख

जो तुम्हारे मुकुट पर चढ़ी

और न भी चढ़ती

पर जिस का सौन्दर्य

उस का अपना था।


यह अन्तर क्या कम है

कि तुम्हारा संगीत

मेरी विवशता है

और मोरपाँख का सौन्दर्य

तुम्हारी ?


बुरा न मानना

कि अब मैं

तुम्हारी बाँसुरी नहीं रहा। 



आचार्यजी की लघु-कविताओं में अपार भाव संसार लहराता है। प्रकृति-चित्रण के माध्यम से मानव-स्मृति में बसी मातृ-स्मृति - 


झर आता है दूध

पहाड़ी की छाती से

चिपटी हुई घास

पीती है पलकें मूँदे


कोरों से बह आती हैं

बूँदें। 


इनकी कविताओं में राजस्थान की मरुभूमि की छाप सहज ही दिखती है -


सूनेपन में अंकुर फूटा:

बोल रहा जल 

रेतीली ख़ामोशी में!



अज्ञेय ने इनके बारे में कुछ यूँ लिखा है - निकट भविष्य में ऐसी स्थिति आ जायेगी कि जिस प्रकार हम कुछ कवियों को सागर के कवि या कुछ कवियों को पर्वतीय सौंदर्य के कवि के रूप में याद करते हैं, उसी तरह नंदकिशोर आचार्य को ‘मरुस्थल के सौंदर्य के अद्वितीय कवि के रूप में याद किया जाएगा। उनकी कविता एक नई दिशा की ओर संकेत करती है, एक नई दृष्टि का प्रमाण देती है।


नंदकिशोर ने कविता के साथ-साथ नाटक भी लिखे हैं। इनका ‘बापू’ नाटक हमारे समय की एक महत्त्वपूर्ण रचना है। गाँधीजी के अंतिम दिनों की मनोदशा का चित्र खींचता है यह नाटक। ‘ज़िल्ले सुभानी’ नाटक में औरंगजेब के जीवन के माध्यम से मनुष्य के भीतरी राजनीतिक द्वंद्व दिखाए हैं। इनके अलावा ‘देहांतर’, ‘पागलघर’, ‘ग़ुलाम बादशाह’ भी इनके प्रसिद्ध नाटक हैं। 

साहित्य को लोकप्रिय और सामान्य पाठक के लिए सुगम बनाने के उद्देश्य से भी आचार्य जी ने काम किया है। इन्होंने मीरा, कबीर तथा अन्य कवियों की रचनाओं के ऐसे छोटे-छोटे संकलन तैयार किये हैं, जहाँ उनकी मुख्य-मुख्य रचनाएँ एक साथ पढ़ी जा सकती हैं। 

नंदकिशोर ने साहित्य एवं संस्कृति का अन्योन्याश्रित सम्बंध दिखाया है। इनका मानना है कि एक के बिना दूसरे की सार्थकर्ता सिद्ध नहीं की जा सकती है। वे यह भी कहते हैं कि हर मानव के जीवन में संस्कृति का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान होता है और उसी की प्रतिध्वनि हमें साहित्य में सुनाई देती है। उनकी दृष्टि से संस्कृति निरंतर प्रवाहमान है जो समय के साथ अपने रूप में परिवर्तन करते हुए अपने आप को अछूता बनाए हुए है।

इनकी आलोचनात्मक पुस्तक ‘रचना का सच’ में तेरह लेख, नौ समीक्षाएँ एवं नौ टिप्पणियाँ हैं। इस रचना के लिए इन्हें के. के. बिड़ला फाउंडेशन की तरफ से 'बिहारी पुरस्कार' प्राप्त हुआ है। इनके लिए कविता लेखन शस्त्र युद्ध से भी बड़ा है, क्योंकि यह कभी हारती नहीं, हराती है। वे लिखते हैं - “कविता के द्वारा लड़ी गई लड़ाई किसी भी शस्त्र युद्ध से अधिक सार्थक है, क्योंकि शस्त्र तो हार सकते हैं पर कविता अपनी लड़ाई कभी नहीं हारती क्योंकि उसे किसी दूसरी कविता से लड़ना नहीं होता - उसे विरोधी परिस्थितियों के बीच अपने समाज की काव्य संवेदना को, जो उस समाज की अस्मिता का ही एक रूप है, न केवल बचाये रखना बल्कि पुष्ट करते रहना होता है।” 

आलोचनात्मक साहित्य के क्षेत्र में पुस्तक ‘अनुभव का भव’ इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही है। हिन्दी के प्रमुख रचनाकारों के कृतित्व में विद्यमान गम्भीर सरोकारों और अंतरदृष्टियों को परखने और उनके वैयक्तिक वैशिष्ट को उजागर करने के लिए यह पुस्तक अति महत्त्वपूर्ण और सार्थक है। 

नंदकिशोर के सात साक्षात्कारों को सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर द्वारा ‘रुबरू’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया है।



आचार्यजी पत्रकार तथा प्राध्यापक के रूप में कार्यरत रहे। वर्धा, हैदराबाद के आईआईआईटी में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी इन्हें इन स्थानों पर व्याख्यानों के लिए बुलाया जाता रहा है। अहिंसा, महात्मा गाँधी और विनोबा भावे के दर्शन को लेकर आचार्यजी ने न केवल काम किया है, बल्कि ‘अहिंसा विश्वकोश’ जैसा अद्भुत ग्रन्थ हमें दिया है। इन्होंने गाँधीजी के जीवन को अन्याय के विरुद्ध न्यायपूर्ण तरीके से संघर्ष माना है। इनके अनुसार हर प्रकार का अन्याय एक प्रकार की हिंसा है। आचार्य जी इंग्लैण्ड, चीन, इंडोनेशिया, बेल्ज़ियम, दक्षिण-अफ्रीका तथा नेपाल की साहित्यिक-शैक्षणिक यात्राएँ कर चुके हैं। इन्होंने अनुवाद के क्षेत्र में ढ़ेर सारा काम किया है। जापान के ज़ेन कवि रियोकान के काव्य संग्रह का हिन्दी में 'सुनते हुए बारिश' नाम से अनुवाद किया। जोसेफ ब्रादस्की, लोर्का, अर्नाल्ड वेस्कर तथा एम.एन. राय के लेखन के साथ ही कई आधुनिक अरबी तथा यूरोपीय लेखकों की रचनाओं का अनुवाद भी किया है।



इनका अज्ञेय से जुड़ा एक संस्मरण है - ‘अज्ञेय की काव्यतितीर्षा’ लिखते समय इनके एक मित्र ने इन्हें अज्ञेय से मिलने का सुझाव दिया था। नंदकिशोर ने अज्ञेय से मिलने में कोई रुचि नहीं दिखाई। इसके पीछे वजह यह थी कि नंदकिशोर ने कहीं से यह अफ़वाह सुन ली थी कि अज्ञेय अहंकारी हैं। नंदकिशोर के शब्दों में - “मेरे मन में जिस लेखक के प्रति इतना सम्मान है, वह अहंकारी हो नहीं सकता लेकिन अगर अहंकारी निकल आए तो मैं ज़िंदगी भर उसका सम्मान नहीं कर पाऊँगा। जिस लेखक को मैं इतना मानता हूँ, उसके सम्मान को क्यों मैं जोखिम में डालूँ।” किताब लिखने के बाद वे अज्ञेय से मिले और उसके बाद लगातार उनके साथ सम्पर्क में रहे और काम भी किया। उन्हें उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। 



आज-कल नंदकिशोर आचार्य जयपुर की ‘प्राकृत भारतीय अकादमी संस्था’ के लिए ‘अहिंसा शांति ग्रन्थ-माला’ परियोजना पर काम कर रहें हैं। इस परियोजना का उद्देश्य अहिंसा और शान्ति के विषयों की गहराई से विवेचना करना है। आचार्यजी की इस परियोजना के अंतर्गत लगभग ५० पुस्तकों के प्रकाशन की योजना है। इस परियोजना के तहत अब तक कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके लिए स्वयं आचार्यजी ने पीटर सिंगर की किताब ‘Life you can save’ और सी. जी. जुंग (C. G. Jung) की पुस्तक ‘The undiscovered self : The dilemma of the individual in modern society’ के हिंदी अनुवाद किए हैं। 



श्रीराम वर्मा ने आचार्यजी के बारे में कहा है - “नंदकिशोर आधुनिक कवियों में सर्वथा अलग हैं। दरअसल वे उज्ज्वल चेतना के ऐसे कवि हैं जिनमें पानीदार चमक है।”

नंदकिशोर आचार्य पर राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘मधुमती’ ने एक महत्त्वपूर्ण अंक निकाला है, जो पत्रिका के पचास वर्षों के इतिहास का एक प्रमुख अंक माना जाता है। 



यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि नंदकिशोर आचार्य की गिनती भारत के कुछ गिने-चुने विद्वानों में होती है। इन्हें जन्मदिन पर स्वस्थ, सक्रिय और सफल जीवन की शुभकामनाएँ और बहुत-बहुत बधाई। 














नंदकिशोर आचार्य – जीवन परिचय

जन्म

३१ अगस्त, १९४५

जन्म स्थान

बीकानेर, राजस्थान, भारत 

पत्नि का नाम

श्रीमती चंद्रकला आचार्य 

व्यवसाय

लेखक, नाटककार, अनुवादक, अध्यापक

साहित्यिक लेखन

कविताएं और कविता संग्रह

चौथा सप्तक (संपादक:अज्ञेय १९७९)   

जल है जहाँ 

वह एक समुद्र था

शब्‍द भूले हुए

आती है जैसे मृत्यु (१९९०)

कविता में नहीं है जो

बारिश में खंडहर

रेत राग

अन्तर्लोक (२००३)

अन्य होते हुए (२००७) 

चाँद आकाश गाता है

यादों में

सपना जो नहीं होता

सपने में (१,२)

मेरी तरह

उड़ना संभव करता आकाश

गाना चाहता पतझड़ (२०१०) 

केवल एक पत्ती ने (२०११)

पचास कविताएँ नई सदी के लिए चयन (२०११) 

इतनी शक्लों में अदृश्य

मुरझाने को खिलते हुए

आकाश भटका हुआ

छीलते हुए अपने को (२०१३)

पढ़त की पगडंडियाँ (२०१५)

कवि का कोई घर नहीं होता

अज्ञेय की काव्यतितीर्षा (२००१)

कविता सुनाई पानी ने

अभिधा में नहीं

हर कोई चाहता है

नाटक संग्रह 



देहांतर (१९८७)

पागलघर (१९८८)

हस्तिनापुर (१९९२)

ज़िल्ले सुभानी (१९९२)

जूते (१९९२) 

ग़ुलाम बादशाह (१९९२)

रंग त्रयी (१९९६) 

किमिदम् यक्षम् 

बापू  

रंग-यात्रा (२०१४)

किसी और का सपना

आलोचना-दर्शन-निबंध – साक्षात्कार 

सर्जक का मन (१९८९)

सभ्यता का विकल्प (१९९५)

साहित्य का स्वभाव (२००१)

आधुनिक विचार और शिक्षा(२००३ )

संस्कृति की सामाजिकी (२००५)

सत्याग्रह की संस्कृति (२००८)

साहित्य का अध्यात्म

रचना का अन्तरंग

रूबरू

नाट्यानुभव

लेखक की साहित्यि (२००८)

मानवाधिकार की संस्कृति (२०१०)

स्वराज के सवाल (२०१२)

रचना का सच

अनुभव का भव

संस्कृति का व्‍याकरण

परम्‍परा और परिवर्तन

मानवाधिकार के तक़ाज़े

मैं कहता आँखिन देखी

निबंध

हिन्दी कविता की नयी सृजनशीलता

देसी लय की पुनर्प्रतिष्ठा

प्रवृत्ति और निवृत्ति की द्वन्द्व-कथा

स्वतन्त्रता की आध्यात्मिक व्याप्ति

मातृभाषा में लौटने की कोशिश

समसामयिकता के बहाने परम्परा पर बहस

साहित्य के गणतन्त्र के लिए

परम्परा : इतिहास की चुनौतियाँ

नयी आध्यात्मिकता

जले हुए समय को पिघलाते हुए

विश्व कोष 

अहिंसा-विश्वकोश

संचयन

अज्ञेय के उद्धरण (२०१९)

अज्ञेय संचयिता (२००१)

विनोबा संचयिता (२०१८)

शोध

दि पॉलिटीक्स इन शुक्रिनीतिसार (१९८७) 

अनुवाद

सुनते हुए बारिश (जापानी जेन कवि रियोकान)

नवमानववाद (एम.एन. राय : न्यू : ह्यूमनिज्म)

विज्ञान और दर्शन (एम.एन. राय : साइंस एंड फ़िलॉसॉफ़ी )

गाँधी की मेज़बानी (२०१८ म्यूरियल लिस्टर)

जोसेफ़ ब्रॉदस्‍की, व्लादिमीर होलन, लोर्का तथा आधुनिक अरबी कविताओं का हिन्‍दी रूपान्‍तरण

सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ भावी इतिहास लेखन की प्रस्तावना (२०१८)

पुरस्कार एवं सम्मान

भुवनेश्वर पुरस्कार

राजस्थान संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

राजस्थान साहित्य अकादमी का सर्वोच्च मीरा पुरस्कार

बिहारी पुरस्कार (बिड़ला फ़ाउंडेशन भुवालका जनकल्‍याण ट्रस्ट

आकाशवाणी का प्रथम पुरस्कार

केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार

यू. पी. सरकार का महात्मा गाँधी सम्मान

विद्यानिवास स्मृति सम्मान

नरेश मेहता सम्मान

महाराजा कुम्भा पुरस्कार

डॉ. घासीराम वर्मा पुरस्कार (२०१६)

द्वारका निधि जयपुर एडलोफ मागदालेना हैनी पुरस्कार (२०१८)

हिंदी साहित्य में सम्पूर्ण योगदान के लिए महात्‍मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्‍दी विश्वविद्यालय, वर्धा के संस्कृति विद्यापीठ में अतिथि लेखक।




संदर्भ:

१. नंदकिशोर आचार्य - विकिपीडिया

२. समालोचन ब्लॉग

३. हिंदी साहित्य विमर्श ब्लॉग 

४. www.apnimaati.com

www.wikiwand.com

५. रचना का सच, नंदकिशोर आचार्य, वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर, १९८६  

६.http://kavitakosh.org/kk/%E0%A4%9D%E0%A4%B0_%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%B9%E0%A5%88_%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A7_/_%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%B0_%E0%A4%86%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF

७.https://www.youtube.com/watch?v=m1Va30Fy8o4&t=382s 







परिचय

सूर्यकांत सुतार 'सूर्या' साहित्य से बरसों से जुडे होने साथ-साथ कई समाचार पत्रों, पत्रिकाओ एवं पुस्तकों में लेख, कविता, गजल, कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं।

चलभाष: +२५५ ७१२ ४९१ ७७७

ईमेल: surya.4675@gmail.com





गायन वादन एवं नृत्य

 

÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷

 गायन, वादन एवं नृत्य का समन्वित रूप संगीत कहलाता है । तीनों स्वतंत्र कला होते हुए भी एक दूसरे की पूरक हैं। हज़ारों साल पहले रचे गए वेदों को संगीत का मूल स्रोत मान सकते हैं। यहाँ तक कि हमारे देवताओं के साथ भी कोई न कोई संगीत की विधा जुड़ी हुई है। नारद जी का एकतारा, भगवान शिव का डमरु, श्रीकृष्ण की मुरली , माँ सरस्वती की वीणा, ये सभी वाद्य आज भी हैं और इनका वर्णन वेद पुराणों में भी है। नृत्य के दोनों प्रकार तांडव और लास्य के प्रदाता तो भगवान शिव एवं माता पार्वती हैं । माँ शारदे तो गीत- संगीत की आद्य देवी हैं । अतः इस बात की पुष्टि होती है कि संगीत के ये तीनो अंग आदिकाल से चले आ रहे हैं । 


              सृष्टि की जब रचना हुई तो ईश्वर ने प्रकृति के कण कण को संगीत से गुंजित करके ही रचा जैसे नदी की कल कल, पक्षियों का कलरव, हवा की सनसनाहट , भौंरे की गुंजन , कलियों के चटकने की आवाज़ । इंसान का बच्चा भी पैदा होते ही रोकर अपने आगमन की सूचना देता है और उसका यह रोना परिवार के लिए सबसे मीठा ,सबसे आनंद दायक सुमधुर संगीत होता है । संगीत के बिना जीवन की ,सृष्टि की कल्पना ही नहीं की जा सकती।  


विशाल जलनिधि के समान संगीत का क्षेत्र भी अत्यंत व्यापक एवं गूढ़ है। संगीत का आरंभ गायन से हुआ ऐसा हम मान सकते हैं। मानव जाति के सामाजिक, सांस्कृतिक और विभिन्न परम्पराओं के साथ ही संगीत का भी विकास होता चला गया होगा। मानव जाति अपना हर्ष, उल्लास व्यक्त करने के लिए संगीत का प्रयोग अनादि काल से करती चली आ रही है।


        स्वर और लय के माध्यम से भावों को शब्दों में बाँध कर गाना ही गायन है । जब इसमें शब्दों का महत्व घट जाता है तब वह शास्त्रीय संगीत और जब शब्दों का महत्व बढ़ जाता है तब वह सरल या सुगम संगीत कहलाता है। शास्त्रीय संगीत नियमबद्ध होता है वहीं सुगम संगीत भावों की स्वरबद्ध अभिव्यक्ति होती है। आजकल तो गायन की असंख्य शैलियां प्रचलित हो गई हैं।


      लय ताल बद्ध अंग संचालन नृत्त कहलाता है किंतु जब उसमें विभिन्न मुद्राओं के साथ भावभंगिमायें दिखाई जायें तो वह नृत्य कहलाता है। गायन की ही तरह नृत्य भी मुख्यतः दो प्रकार का होता है -शास्त्रीय नृत्य एवं लोक नृत्य ।


         गायन एवं नृत्य के साथ जब मानव को साथ संगत की कमी लगने लगी होगी तब उसने वाद्यों का निर्माण किया होगा। वाद्यों के निर्माण में भी संगत वाद्य, ताल वाद्य, समूह में बजाने वाले वाद्य, पारम्परिक वाद्य आदि प्रकार के वाद्यों को यथा संभव और आवश्यकतानुसार निर्मित करता चला गया होगा। 


              तेरहवीं सदी के विद्वान शारंगदेव ने अपनी पुस्तक संगीत रत्नाकर में लिखा है कि गीत , वाद्य एवं नृत्य की प्रतिष्ठा ताल से हुई है एवं प्रतिष्ठा वाचक धातु रूप 'तल' से ताल शब्द की उत्पत्ति हुई। कुछ लोग मानते हैं कि तांडव नृत्य के ता और लास्य के ल के संयोग से ताल शब्द बना । कह सकते हैं कि शिव और शक्ति के योग से ताल बना इसीलिए संगीत के अखंड काल को नापने और विभाजित करने में सक्षम है। ताल स्वरों को और नृत्य को एक निश्चित नियम में बांध कर एक गति प्रदान करता है जिससे संगीत में अनुशासन आ जाता है । तालों को बजाने के लिए ही वाद्यों की आवश्यकता महसूस हुई इसीलिए ताल वाद्यों का आविष्कार हुआ । कहते ही हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है। समय के साथ साथ विभिन्न प्रकार के वाद्य विकसित हुए जिन्हें चार वर्गों में बांटा। 

1- सुषिर वाद्य जिनमें स्वर की उत्पत्ति वायु या फूँक से होती है जैसे हारमोनियम,माउथऑर्गन आदि।

२ - तत् वाद्य जिनमें स्वरोत्पत्ति तार , रेशम या ताँत से होती है जैसे सितार, सन्तूर, सारंगी आदि।  

३- घन वाद्य जिनमें लकड़ी या किसी वस्तु के आघात से आवाज़ निकलती है जैसे जलतरंग काष्ट तरंग आदि। 

४- अवनद्ध वाद्य सबसे महत्वपूर्ण है । अन्य वाद्य स्वर वाद्य हैं किन्तु ये ताल वाद्य हैं । इनके ऊपर चमड़ा मढ़ा होता है और ये हाथ या लकड़ी से बजाये जाते हैं जैसे तबला, मृदंग, ढोल आदि। गायन और नृत्य में इन अवनद्ध वाद्यों का सबसे ज्यादा महत्व है क्योंकि इनकी संगत के बिना गायन और नृत्य अपनी पूर्णता को नहीं प्राप्त करते । रंजकता अपने उत्कर्ष पर नहीं पहुँच सकती इनके अभाव में ।


 संगीत का सबसे आवश्यक अंग है लय । लय नहीं तो संगीत नहीं ,या यूँ भी कह सकते हैं की लय नहीं तो जीवन नहीं क्यों कि हम सांस भी एक लय में ही लेते हैं । जहाँ साँसों की लय बिगड़ी जीवन अवरूद्ध हो जाता है उसी प्रकार गायन ,वादन और नृत्य तीनों में ही जहाँ लय टूटी या बिगड़ी उसका सौंदर्य समाप्त हो जाता है। बिना लय के संगीत मृतप्राय हो जाता है ।


संगीत के तीनों आधार- गायन, वादन और नृत्य- संगीत के मूल तत्व स्वर और लय पर निर्भर होते हैं। अब गायन तथा नृत्य ये दोनों माध्यम ऐसे हैं जो बिना किसी वादन की सहायता से रंजकता पैदा कर ही नहीं सकते और संगीत का सबसे बड़ा गुण रंजकता प्रदान करना ही है। इसके अभाव में गायन एवं नृत्य दोनों ही कलाएं शून्य हो जाती हैं विशेष कर नृत्य की तो गायन एवं वादन दोनों पर ही निर्भरता है ।इसलिए इन दोनों ही कलाओं की प्रस्तुति के लिए स्वर वाद्य एवं ताल वाद्य की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। संगीतज्ञ एवं नर्तक अपनी कला से दर्शकों एवं श्रोताओं को रस की अनुभूति करा कर मंत्रमुग्ध कर सकें इसके लिये वाद्यों की नितांत आवश्यकता होती है। 


               निष्कर्ष यही निकलता है कि चूंकि गायन वादन और नृत्य का आधार स्तंभ स्वर, लय और ताल है इसलिये तीनों को ही एक दूसरे की आवश्यकता होती है, तीनों ही एक दूसरे के पूरक हैं।


        मंजु श्रीवास्तव'मन'

   वर्जीनिया , अमेरिका


भगवतशरण उपाध्याय : इतिहास और पुरातत्व के अन्वेषक


"संस्कृति एक प्रकार का मानसिक विकास है, एक विशिष्ट दृष्टिकोण, जो सभ्य मानव में हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती है। यह एक प्रकार का संस्कार है, मानसिक निखार, और यह संस्कार व्यक्तिगत भी हो सकता है, सामूहिक भी---------"

पुरातत्व व इतिहास द्वारा मानव मूल्यों व समानता के तत्वों के खोजकर्ता भगवतशरण उपाध्याय ने उपरोक्त पंक्तियों में संस्कृति के अंतरावलम्बन को प्रस्तुत किया है। भगवतशरण उपाध्याय प्रसिद्ध शिक्षाविद तथा हिन्दी के साहित्यकार थे। उन्होंने अपनी कृतियों में भारतीय कला, संस्कृति, इतिहास, स्थापत्य एवं पुरातत्व जैसे गहन विषयों पर गंभीर गवेषणा प्रस्तुत की है। 

भगवतशरण उपाध्याय का जन्म १९१० ई० में बलिया जिले के उजियारपुर गाँव में हुआ था। इनके पिताजी का नाम पंडित रघुनन्दन उपाध्याय तथा माता का नाम महादेवी था। इनके पिताजी बलिया जनपद के एक अच्छे व प्रसिद्ध वकील थे। भगवत शरण उपाध्याय जी ने वर्ष १९२७ में बलिया से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक तथा बनारस विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास में एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात पटना में परम विद्वान, प्रसिद्ध इतिहासकार व दार्शनिक काशीप्रसाद जायसवाल के साथ इतिहास पर शोधकार्य किया। इन्होंने मध्य पूर्व तथा पश्चिमी एशिया के प्राचीन स्थलों ट्राय, निनेवे, बाबुल आदि का पुरातात्विक अध्ययन किया।

भगवतशरण उपाध्याय जी के बारे में यह भी कहा जाता है कि अपने छात्र जीवन में इन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध आजादी की लड़ाई में भाग लिया व दो बार जेल भी गये। वर्ष १९४० से वर्ष १९४४ तक पुरातात्विक संग्रहालय लखनऊ के क्यूरेटर व उसके विभागाध्यक्ष रहे। तत्पश्चात पिलानी के बिड़ला कालेज में इतिहास के प्राध्यापक नियुक्त हुए। वर्ष १९५२ में चीन में होने वाले विश्व शांति सम्मेलन में भारतीय शिष्ट मंडल के एक प्रमुख सदस्य की हैसियत से भाग लिया। वर्ष १९५३ से १९५६ तक इंस्टीट्यूट आफ एशियन स्टडीज़, हैदराबाद के निदेशक  रहे। इन्होंने अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, पेरिस, कैनबरा आदि स्थानों पर भी शिष्ट मंडल के सदस्य के रूप में यात्रायें कीं। उपाध्याय जी ने काशी विश्वविद्यालय की 'अनुसंधान' पत्रिका का संपादन भी किया। वर्ष १९५७ से १९६४ तक चार खंडों में 'हिन्दी-विश्व कोश' का संपादन किया। जिसका प्रकाशन काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा किया गया। इनके द्वारा तीन खंडों में 'भारतीय व्यक्ति कोश' का संपादन भी किया गया। यूरोप के विद्यालयों में इन्होंने विजिटिंग प्रोफेसर की भूमिका में अनेकों विद्यार्थियों को प्राचीन इतिहास को गहनता के साथ पढ़ाया। विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के निमंत्रण पर वह कई बरसों तक प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष रहे। तत्पश्चात प्राच्य विद्या सम्मेलन, उज्जैन के कालीदास विभाग में मनोनीत किये गए। वर्ष १९८१ में उन्हें मारीशस का राजदूत नियुक्त किया गया। 

भगवतशरण उपाध्याय जी का रचना संसार

भगवत शरण उपाध्याय जी ने साहित्य, पुरातत्व व इतिहास से संदर्भित सौ से अधिक पुस्तकों की रचना की है। इतिहास के अति प्राचीन पन्नों से उन्होंने इस समाज को जीवंत करने के लिये अनेकों अमूल्य निधियों को प्रस्तुत किया। इसी प्रकार पुरातत्व के गह्वरों की अतल गहराइयों से तमाम पुरानी सभ्यताओं के अवशेषों से उस काल खंड का समूचा चित्र हमारी आँखों के समक्ष साकार कर दिया है। उनकी प्रसिद्ध रचना ‘कालिदास का भारत’ दो खंडों में प्रकाशित हुई। उसके प्रकाशन से संबधित लेखक का यह अंश उस समय की सामाजिक व आर्थिक पृष्ठभूमि से अवगत कराता है। 

"कालिदास पर मेरा यह १६ वर्षों का अध्ययन प्रस्तुत है, यह अध्ययन भौगोलिक सामग्री, राज्य-शास्त्र और शासन, सामाजिक जीवन, ललित कला, आर्थिक स्थिति, शिक्षा और साहित्य एवं धर्म तथा दर्शन आदि प्रकरणों में संपन्न हुआ है। -------- जैसा कि ग्रंथ के नाम ‘कालिदास का भारत’ से प्रकट है, प्रस्तुत अध्ययन उस भारत के पट खोलता है, जिसमें महाकवि ने साँस ली है, अपनी साहित्य कला का रूपायन किया है---------।" 

यूनानी इतिहास, दर्शन व वहाँ के धार्मिक साहित्य का गहन अध्ययन कर भगवत शरण उपाध्याय जी ने यूनानी देवताओं व नायकों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को लेकर कई निबंधों की रचना की। यूनानी नायकों का एक पात्र गिलगमेश है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह आज भी समुद्र की अतल गहराइयों में तैरता हुआ मृत्यु पर विजय पाने की औषधि खोज रहा है। जब उसे यह औषधि मिल जायेगी, तभी वह एक विजेता के रूप में लौटकर विश्व की सँपूर्ण मानव-जाति का कल्याण करेगा। 

भगवत शरण उपाध्याय जी की कृति 'कला का इतिहास' में वास्तु-स्थापत्य, मूर्तन और चित्रण तीनों कला- विधाओं का प्रागैतिहासिक काल से पन्द्रहवीं सदी तक सांगोपांग इतिहास प्रस्तुत किया गया है। कहा जाता है कि भारतीय कला से सम्बंधित हिन्दी में यह पहली वैज्ञानिक पुस्तक है। इस पुस्तक में भारतीय संस्कृति से प्रभावित दूसरे देशों - नेपाल, तिब्बत, लंका, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान, चीन आदि तथा अन्य दक्षिणी - पूर्वी एशियाई देशों की कला को भी समाहित किया गया है।

भगवत शरण उपाध्याय जी की दूसरी पुस्तक 'भारतीय संस्कृति के स्रोत' में आर्यों और उनके पूर्ववर्ती समाज से लेकर इस्लाम व अंग्रेजों के काल तक के इतिहास की प्रमुख सांस्कृतिक प्रवृत्तियों व उपलब्धियों को रेखांकित किया गया है।

भगवत शरण उपाध्याय की एक और पुस्तक ‘भारतीय समाज के ऐतिहासिक विश्लेषण’ में अपने ऐतिहासिक- सांस्कृतिक निबंधों के माध्यम से इतिहास, दर्शन, राजनीति से जुड़े प्राचीन, मध्ययुगीन और समसामयिक विषयों पर प्रकाश डाला गया है। इसमें गीता-दर्शन, भारतीय चिंतन की द्वंद्वात्मक प्रगति, संस्कृतियों का अंतरावलम्बन, भारतीय संस्कृति के निर्माण में विविध जातियों का योग, भारतीय संस्कृति में ग्राह्य और अग्राह्य, भारतीय वर्ण व्यवस्था,

दास-प्रथा का विकास, संस्कृति के विरुद्ध प्राकृतों का विद्रोह, इतिहास-दर्शन आदि कुल मिलाकर चौदह निबन्धों में विस्तृत प्रकाश डाला गया है।

इनकी एक और बहुचर्चित कृति 'खून के छींटे इतिहास के पन्नों पर' है। जिसमें मानवीय प्रवृत्तियों, नारी और शूद्रों, गुलामों व अस्पृश्यों का भयंकर शोषण को रेखांकित किया गया है। जिसमें नारी, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, दास, अन्त्यज, लेखक के मुख से उनकी गाथा-व्यथा-पीड़ा कहलाई गई है। इस पुस्तक का एक अंश दृष्टव्य है। "मैं अन्त्यज हूँ, अछूत! मेरा इतिहास उतना प्राचीन है, जितना भारत पर आर्यों का आक्रमण। मेरे विषय में, विशेषकर मेरी शाखाओं-प्रशाखाओं के विषय में जानने के लिए मनुस्मृति का बारहवां अध्याय देख लीजिए। परंतु वह, जहाँ तक मेरी जातीयता का सम्बंध है, एक विजयी जाति का दृष्टिकोण है। अपना इतिहास मैं स्वयं कहना चाहूँगा। ------- कहानी दर्द की है और उसके दौरान स्याही पुती है। नि:संदेह दु:ख का अनवरत तारतम्य, जीवन की अनुभूति होने के कारण, दुःख भी सामान्य हो गया है। फिर भी समय-समय की भीषण कष्ट-चेतना उन युगों की याद दिलाती है जो भारतीय इतिहास के गौरवमय अतीत पर गहरे व्यंग हैं।"

भगवतशरण उपाध्याय जी की एक और पुस्तक 'बुर्जियों के पीछे' बहुत ही रोचक व बोधगम्य शैली में लिखी गई है। इस पुस्तक में स्थापत्य कला की विश्व में प्रसिद्ध इमारतें, जिनकी कारीगरी देखकर आश्चर्य चकित रह जाता है। लेकिन इनके बनने के पीछे के दारुण चीखें, जुल्म और अत्याचारों की दास्तान जो उस मेहनतकश जनता ने झेले, जिन्होंने उन इमारतों के निर्माण में अपना सब कुछ होम कर दिया यहाँ तक कि अपना और अपने परिवार का जीवन भी। पुस्तक में जिन इमारतों की कहानियों को लिपिबद्ध किया गया है, उनमें ताज, उड़ीसा के मन्दिर, पिरामिड, कोलोसियम, वर्साई का महल, चीनी दीवार, बैस्टिल, ऊर की कब्र हैं। 

यों तो भगवत शरण उपाध्याय जी ने १००‍ से अधिक पुस्तकें लिखीं हैं, उनकी सभी किताबें अद्भुत तो हैं ही, इसके साथ ही नव ज्ञान का दर्शन कराती हैं। लेकिन इस संक्षिप्त आलेख में उक्त सभी का उल्लेख संभव नहीँ है। अंत में उनके निबन्ध, 'सूना' के इस अंश का उल्लेख आवश्यक प्रतीत होता है। “और सामने की पहाडियाँ जैसे नज़र से ओझल हो उठती हैं। उनके ऊपर घनीभूत धुएँ की तरह एक आवाज़ उठती आ रही है, उमड़ती घुमड़ती आवाज़। उस जुलूस की आवाज़ जिसे महादेव सिंह लिए जा रहा है। जो धारा-सभा की ओर बढ़ता जा रहा है और बाजू में चारों ओर रिसाला है, चट्टानों सा खड़ा। 'हाली' (हैदराबादी सिक्के) की बदलती तकदीर मजदूरों की मजूरी से टकरा गई है। मजदूरों का जुलूस बढ़ चलता है, लाठियाँ उठ पड़ती हैं, आंसू-बम फट पड़ते हैं। महादेव सिंह लड़खड़ाकर गिर जाता है। जन- कवि म़ँजीत की आवाज़ मजदूरों की आवाज़ के ऊपर उठ हवा के परों पर चढ़ चलती है। लाठी की चोट से वह गिर जाता है और बेहोश हो जाता है। पर आवाज़ बुलन्द है, क्योंकि आवाज़ कभी नहीं मरती। वह हवा के डैनों पर है। सामने पहाड़ियों पर, बिखरी चोटियों पर वह आवाज़ धुएँ से छाई हुई है। जिंदगी अस्मत के लिए लड़ रही है।"

ऐसे महान इतिहासकार, पुरातत्वविद, साहित्यकार भगवतशरण उपाध्याय मारीशस में भारत के राजदूत रहते हुये १२ अगस्त, १९८२ को वह हमारे बीच से सदा- सदा के लिए चले गये। वह  अपने पीछे विपुल साहित्यक, पुरातात्विक व ऐतिहासिक खजाना छोड़ गये। जिसकी रश्मियाँ जहाँ एक ओर तो विद्या का रसास्वादन करने वाले महान मनीषियों को आकर्षित करतीं हैं, तो वहीं दूसरी ओर न्याय, बंधुता, समानता व स्वतंत्रता के आधार, शोषण रहित समाज के स्वप्नदृष्टाओं व उसके लिए अथक कर्मरत योद्धाओं का पथप्रदर्शन करतीं हैं।

आज भी प्रतीत होता है कि सत्य का वह अन्वेषी कहीं दूरस्थ क्षेत्र में ऐतिहासिक धरोहरों को निरंतर खोज रहा है और अभी एक और अमूल्य ऐतिहासिक व पुरातात्विक धरोहर हमारे समक्ष प्रकट होने वाली है।

भगवतीशरण उपाध्याय जी का जीवन परिचय

पिता का नामपं- पंडित रघुनन्दन उपाध्याय

पेशे से बलिया के प्रतिष्ठित वकील

माता का नाम  -महादेवी

जन्म- १९१० ई० बलिया (उत्तर-प्रदेश) के उजियारपुर में

शिक्षा 

प्रारम्भिक शिक्षा बलिया में वर्ष १९२७ में मैट्रिक पास किया।

इलाहबाद विश्व विद्यालय से स्नातक काशी विश्वविद्यालय से प्राचीन

इतिहास में एम० ए०।

कार्य क्षेत्र 

दार्शनिक, इतिहासकार, साहित्यकार

काशी विश्वविद्यालय की 'अनुसंधान' पत्रिका का सम्पादन

१९४० में लखनऊ संग्रहालय के पुरातात्विक विभाग के अध्यक्ष

प्रयाग संग्राहलय के भी अध्यक्ष रहे।

वर्ष १९४३ में पिलानी बिड़ला कालेज में इतिहास के प्राध्यापक 

विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में प्राचीन इतिहास के प्रोफेसर व कालांतर में अध्यक्ष

प्राच्य विद्या सम्मेलन, उज्जैन के कालिदास विभाग के मनोनीत अध्यक्ष रहे।

वर्ष १९५३ से १९५६ तक इंस्टीट्यूट आफ एशियन स्टडीज़, हैदराबाद के निदेशक  रहे।

वर्ष १९९८१ में मारीशस में भारत के राजदूत रहे।

साहित्यक कृतियाँ - १०० से अधिक पुस्तकों का सृजन

प्रमुख पुस्तकें 

विश्व साहित्य की रूपरेखा, कालिदास का भारत (दो खँड में), कादम्बरी, ठूँठा आम, लाल-चीन, गँगा-गोदावरी, बुद्ध वैभव, साहित्य और कला, सागर की लहरों पर, खून के छींटे इतिहास के पन्नों पर, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, भारतीय कला का इतिहास, भारतीय संस्कृति के स्रोत, बुर्जियों के पीछे, पुरातत्व का रोमांस, समीक्षा के संदर्भ, गुप्तकाल का सांस्कृतिक इतिहास, वीमेन इन ॠगवेदा, एनिशिएन्ट वर्ल्ड, फेदर्स आफ इंडियन कल्चर आदि।

ज्ञान कोश एवं संपादन 

भारतीय व्यक्ति कोश (तीन खँडों में)

भारतीय साहित्य कोश (चार खँडों में) 

भारतीय इतिहास के आलोक स्तंभ (दो खँडों में),

प्राचीन यात्री (तीन खँडों में)

मृत्यु

१२ अगस्त, १९८२ 

संदर्भ:

कालिदास का भारत

भारतीय कला का इतिहास

भारतीय संस्कृति के स्रोत

खून के छींटे इतिहास के पन्नों पर

भारत का ऐतिहासिक विश्लेषण

बुर्जियों के पीछे

विकिपीडिया: भगवत शरण उपाध्याय

भारत कोश: भगवत शरण उपाध्याय

गद्य कोश : भगवत शरण उपाध्याय 

लेखक: सुनील कुमार कटियार


सुनील कुमार कटियार जनवादी लेखक संघ की उत्तर-प्रदेश राज्यपरिषद के सदस्य, उत्तर प्रदेश सहकारी फेडरेशन से सेवा निवृत्त, जनवादी चिंतक, स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन, शिक्षा-एम०ए० अर्थशास्त्र, जनपद फर्रुखाबाद में निवास

मोबाइल नं० ७९०५२८२६४१ / ९४५०९२३६१ 

मेल आईडी-sunilkatiyar57@gmail.com


Friday, September 05, 2025

देवेन्द्र सत्यार्थी

[देवेन्द्र सत्यार्थी और प्रकाश मनु]

[देवेन्द्र सत्यार्थी और प्रकाश मनु]

 देवेन्द्र सत्यार्थी और प्रकाश मनु-


Sunday, June 18, 2023

Wednesday, May 10, 2023

डा० जीवन शुक्ल

हम दोनों साथ-साथ हैं 
 (उमाकांत मालवीय और जीवन शुक्ल) 
------------------
हम दोनों हम उमर थे, हम नवा थे, हम राह भी थे। उमाकांत मालवीय एजी ऑफिस में थे, मैं सी डी ए (पेंशन) में। उनका ऑफिस मेरे रास्ते में पड़ता था। जब वो ऑफिस के लिए निकलते थे, तो मेरे मोहल्ले की सरहदें छूते हुए जाते थे। मैं भरती भवन, मालवीय नगर में किराए के मकान नम्बर 440 में था। उमाकान्त भी किराये के मकान कल्याणी देवी के पास रहते थे। उनके मकान का नंबर नहीं मालूम।
लोग आश्चर्य कर सकते हैं कि ऐसे भी दोस्त हो सकते हैं, जो एक कोख के न होते हुए भी बहुत बातों में एक कोखी से भी अधिक थे। दिन भर नौकरी चाकरी शाम को जानसन गंज में निर्मल टी स्टॉल पर बदौआ गुरू की महफिल में चायबाजी, गप सड़ाका, इंगलैंड के डा. जानशन के ज़माने के कॉफी हाउस कल्चर की बुद्धजीवी बैठक का आनंद। टी स्टाल क्या था दो बेंचों और टेबुल का वो टी हाउस था जिसमें उस समय के व्हीलर बुकस्टाल पर हॉट स्केल पर बिकने वाली पत्रिकाओं (सजनी, साजन, शेर बच्चा )के प्रकाशक, सम्पादक नरसिंह राम शुक्ल, जिनके यहाँ उस समय के चर्चित नवोदित कलमकार आर्थिक आश्रय पा चुके थे, वे भी अपनी कीर्ति के उतार पर भले ही थे, पर उनकी रहीसत की चर्चा का यह प्रसंग कि उन्होंने मोतीलाल नेहरू की कार खरीदी थी और वो बड़े गर्व से बताते थे कि वो उस पर बैठकर सब्जी खरीदने जाते थे। 
नई कविता के लक्ष्मीकांत वर्मा, भारत के परिशिष्ट संपादक परमानंद शुक्ल, उप संपादक विष्णुकांत 
मालवीय, कभी-कभी बादशाही मंडी में उस समय रहे रामनाथ अवस्थी, हरी जी रेडियो के पंचायत घर के प्राण तथा अवधी के महान कवि पढ़ीस के बेटे युक्तिभद्र दीक्षित, हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रभाकर शास्त्री, बाल साहित्य लेखक प्रेम नारायण गौड़, चर्चित तूलिका कलाकार इस्माइल साहब, कैलाश कल्पित आदि  उमाकांत मालवीय और जीवन शुक्ल से मिलने वाले लोग इकट्ठे होते थे।
साहित्य का टाइम पास मनोरंजन और बदौआ गुरू का उम्र की ऊँचाई निचाई छोड़ आत्मीय व्योहार उस टी हाउस का आकर्षण था। एजी ऑफिस तो कवियों, लेखकों का आश्रय कुंज ही लगता था। वहाँ हिंदी ही नहीं उर्दू के लोग भी अपने परिवारों की रोटी रोज़ी का इंतजाम इज्जत के साथ कर लेते थे। केंद्रीय सरकार के ये दो आफिस, यानी जिसमें मैं काम करता था, और ए जी ऑफिस उस समय ही नहीं आज भी प्रयागराज की शान हैं। मैं शादीशुदा ही नहीं दो बच्चों का पिता था पर उमाकांत अविवाहित थे। उनकी विधवा माँ, एक बड़े भाई की भी आज याद आ गई। उनकी शादी जब कानपुर में हुई उसमें कवियों की बिरादरी का मैं अकेला साथी था।
जिस परिवार में उमाकांत का ब्याह हुआ था, उनमें से एक व्यक्ति मेरे साथ मनीराम बगिया के सी ए वी स्कूल कानपुर के सहपाठी थे। ऐसा उनको बारात में देखकर याद  आया। उन्होंने भी मुझे देखा पर शायद हम दोनों एक दूसरे का नाम भूल चुके थे, इसलिए एक दूसरे को देखा तो जरूर पर बात नहीं की। उस शादी में एक अभिनंदन पत्र छपा था, उसमें उमाकांत मालवीय का वह उपनाम भी छपा था जो शायद उनके बेटे यश ने भी कभी किसी को प्रयोग करते न देखा या सुना हो। वह नाम था "बादल"। लेकिन जब हम मिले थे, तब तक वह बादल बरस कर समय की अरावली पहाड़ियों में विसर्जित हो चुका था।
लोगों को आज ये पढ़कर आश्चर्य होगा कि उस समय हम दोनों को एक साथ कवि गोष्ठियों में देखकर लोग  मुस्कराकर कभी-कभी कह देते थे "निराला पंत की जोड़ी है।"  लेकिन हमारे बीच कभी भी ऐसा मानदंड नहीं जन्मा। मैं तो प्रवासी था, उमाकांत वहीं के थे पर हमारे बीच पारिवारिक अंतरंगता थी। एक दूसरे के प्रति सम्मान था, एक दूसरे की प्रतिभा से ईर्ष्या नहीं थी, बल्कि गहरा आदर था। नई कविता के युग में इलाहाबाद में जब उमाकांत और मेरे गीतों की लोग चर्चा करते थे उस समय मैं कहता था "उमाकांत अच्छा लिखते हैं" और उमाकांत कहते "जीवन से मैंने बहुत कुछ पाया है"। हम दोनों की कुंडली "वंशी तुम धरदो" (1961) तथा "मेंहदी माहउर" (1962) के रूप में सामने है, उसे देखकर समझा जा सकता है।
इलाहाबाद का यह वो युग था जब नई कविता जन्म ले चुकी थी। नई कहानी प्रसव पीड़ा से गुजर रही थीं, नवगीत अस्तित्व में आ चुका था। यानी निराला, पंत, महादेवी के बाद का हिंदी साहित्य अपना आकार ले रहा था। यह दूसरे तारसप्तक का युग था।
निराला के दर्शन की आकांक्षा इलाहाबाद लाई थी। परिवार का मेरे कंधों पर बढ़ता बोझ जबरदस्ती कानपुर फिर वहाँ से कन्नौज ले आया। जब तक अकेला चलकर जा सकता था, वर्ष में एक दो बार उस उमाकांत से मिल आता था, जिसके साथ उस नव काल की पुरवा, पछवा के थपेड़े खाए थे। उन दिनों की गंध बटोरने कभी अग्रवाल धर्मशाला, कभी महेश दादा (पूर्व मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय, इलाहाबाद) के बंगले नर्मदेश्वर उपाध्याय के घर, युक्तिभद्र दीक्षित के निवास पर या लक्ष्मी होटल में रुककर विसर्जित कुंभ के संगम में स्नान कर लेता था।

 परिवार के आर्थिक बोझ से टूटा मन 1992 के बाद सँभला तब तक चिड़ियाँ खेत चुग चुकीं थीं। बीच में हम मानस संगम के मंच पर मिले भी पर न हम एक नाव पर थे, न एक धार पर थे। हाँ एक बहती नदी जरूर हमारे बीच दिखती थी। 
आज यश ने एक पोस्ट उमाकांत के चित्र ओर उनके एक गीत के साथ डाली तो 92 वर्ष की आयु में उमड़े वेग के साथ मैं भी बह निक्ला।
वैसे पद्मकांत मालवीय, डा रामकुमार वर्मा, डा जगदीश गुप्त, लक्ष्मीकांत वर्मा, नर्मदेश्वर उपाध्याय, हरी मालवीय, हरिमोहन मालवीय श्रीनारायण चतुर्वेदी और कमला शंकर सिंह (महान चित्रकार) जिनके यहाँ निराला ने अंतिम साँस ली थी, उनके दर्शन इस विस्मृत अश्वतीर्थ की धरती पर भी हुए। कुछ ने तो घर को आकर पवित्र किया। महेश दादा तो कई बार धर्मधाम में आए।
आज अपनी एक ग़ज़ल का शेर याद आ रहा है-
सभी यहाँ हैं मगर तुम नहीं तो लगता है
दिया है तेल है बाती है रौशनी गुम है।

-जीवन शुक्ल
10-5-23

Monday, May 08, 2023

महावीर प्रसाद द्विवेदी कि पत्र

दौलतपुर [रायबरेली] 
२२-१०-१९२८

प्रिय चतुर्वेदीजी , नमोनम: ।
१९ अक्तूबर की चिट्ठी मिली । उसकी लंबाई को देख करके ही डर गया । यह सोच कर कि मुझे इससे भी लंबा जवाब लिखना पड़ेगा , मैं घबरा सा गया । खैर , जो भोग-भाग्य में बदा है ,उसे भोगना ही पड़ेगा । दीर्घायुर्भूयात्‌ । 
```````````लोकोक्तिकोश वाले खत्रीजी [शायद दामोदर दास ] को यह चिट्ठी दिखाइये और उनसे कहिये कि मैं उनसे , मुर्शिदाबाद वाले नवाबी जगत्सेठों से तथा कारनेगी और राकफेलर से भी अधिक अमीर हूँ । अमीर किसे कहते हैं , शायद वे नहीं जानते , शंकराचार्य जानते हैं , वे कहते हैं कि जो जितना अधिक संतोषशील है ,वह उतना ही अधिक अमीर है और जो जितना तृष्णालु है ,वह उतना ही दरिद्र है। मैं तो दुनिया-भर के अमीरों को ,लक्षाधीशों को ही नहीं ,कोट्यधीशों को भी अपने सामने तिनका-
...निस्पृहस्य तृणं जगत्‌ ... समझता हूँ ।
ये लोग दूसरों के मालमत्ते की मापतोल अपने मानदंड से करते हैं , यह कभी नहीं सोचते कि उनसे पूछें कि तुम्हें किसी चीज की कमी तो नहीं है ? और यदि हो तो उसे दूर करने की कोशिश करें !
१७ बरस की उम्र से मैंने रेलवे मे मुलाजिमत शुरू की थी , मुझे २०० रुपये मिलते थे । १८ बरस तक सरस्वती का काम किया , छोड़ने के वक्त कुल १५० मिलते थे । कभी एक पैसा भी किसी से हराम का नहीं लिया । मेरा रहन-सहन ,घर-द्वार सब आपका देखा हुआ है । कानपुर का कुटीर भी आप देख चुके हैं । 
इस तरह रह कर जो कुछ बचाया , वह खैरात कर दिया ।
कानपुर का पुस्तक-संग्रह नागरी-प्रचारिणी को दे चुका हूँ , अब जो मेरे पास बचा है ,उसे हिन्दू-विश्वविद्यालय को देने के लिये लिखा-पढ़ी कर रहा हूँ ।
यह सब लिख दिया है ,डर यह है कि मेरे मरने के बाद कहीं आप ये बातें छपवाने न दौड़ पड़ें । मैं इसकी जरूरत नहीं समझता ।
आपका 
-महावीर प्रसाद द्विवेदी

Wednesday, August 17, 2022

डा० विश्व दीपक बमोला

डा० विश्व दीपक बमोला 

 

ओमप्रकाश यती


 

ज्ञान चतुर्वेदी

 


कमलेश भट्ट कमल

 

कमलेश भट्ट कमल 

पवन कुमार

 

जगदीश व्योम

 

कमलकिशोर गोयनका

 

शिवजी श्रीवास्तव

 
डा० शिवजी श्रीवास्तव

हरेराम समीप