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गायन, वादन एवं नृत्य का समन्वित रूप संगीत कहलाता है । तीनों स्वतंत्र कला होते हुए भी एक दूसरे की पूरक हैं। हज़ारों साल पहले रचे गए वेदों को संगीत का मूल स्रोत मान सकते हैं। यहाँ तक कि हमारे देवताओं के साथ भी कोई न कोई संगीत की विधा जुड़ी हुई है। नारद जी का एकतारा, भगवान शिव का डमरु, श्रीकृष्ण की मुरली , माँ सरस्वती की वीणा, ये सभी वाद्य आज भी हैं और इनका वर्णन वेद पुराणों में भी है। नृत्य के दोनों प्रकार तांडव और लास्य के प्रदाता तो भगवान शिव एवं माता पार्वती हैं । माँ शारदे तो गीत- संगीत की आद्य देवी हैं । अतः इस बात की पुष्टि होती है कि संगीत के ये तीनो अंग आदिकाल से चले आ रहे हैं ।
सृष्टि की जब रचना हुई तो ईश्वर ने प्रकृति के कण कण को संगीत से गुंजित करके ही रचा जैसे नदी की कल कल, पक्षियों का कलरव, हवा की सनसनाहट , भौंरे की गुंजन , कलियों के चटकने की आवाज़ । इंसान का बच्चा भी पैदा होते ही रोकर अपने आगमन की सूचना देता है और उसका यह रोना परिवार के लिए सबसे मीठा ,सबसे आनंद दायक सुमधुर संगीत होता है । संगीत के बिना जीवन की ,सृष्टि की कल्पना ही नहीं की जा सकती।
विशाल जलनिधि के समान संगीत का क्षेत्र भी अत्यंत व्यापक एवं गूढ़ है। संगीत का आरंभ गायन से हुआ ऐसा हम मान सकते हैं। मानव जाति के सामाजिक, सांस्कृतिक और विभिन्न परम्पराओं के साथ ही संगीत का भी विकास होता चला गया होगा। मानव जाति अपना हर्ष, उल्लास व्यक्त करने के लिए संगीत का प्रयोग अनादि काल से करती चली आ रही है।
स्वर और लय के माध्यम से भावों को शब्दों में बाँध कर गाना ही गायन है । जब इसमें शब्दों का महत्व घट जाता है तब वह शास्त्रीय संगीत और जब शब्दों का महत्व बढ़ जाता है तब वह सरल या सुगम संगीत कहलाता है। शास्त्रीय संगीत नियमबद्ध होता है वहीं सुगम संगीत भावों की स्वरबद्ध अभिव्यक्ति होती है। आजकल तो गायन की असंख्य शैलियां प्रचलित हो गई हैं।
लय ताल बद्ध अंग संचालन नृत्त कहलाता है किंतु जब उसमें विभिन्न मुद्राओं के साथ भावभंगिमायें दिखाई जायें तो वह नृत्य कहलाता है। गायन की ही तरह नृत्य भी मुख्यतः दो प्रकार का होता है -शास्त्रीय नृत्य एवं लोक नृत्य ।
गायन एवं नृत्य के साथ जब मानव को साथ संगत की कमी लगने लगी होगी तब उसने वाद्यों का निर्माण किया होगा। वाद्यों के निर्माण में भी संगत वाद्य, ताल वाद्य, समूह में बजाने वाले वाद्य, पारम्परिक वाद्य आदि प्रकार के वाद्यों को यथा संभव और आवश्यकतानुसार निर्मित करता चला गया होगा।
तेरहवीं सदी के विद्वान शारंगदेव ने अपनी पुस्तक संगीत रत्नाकर में लिखा है कि गीत , वाद्य एवं नृत्य की प्रतिष्ठा ताल से हुई है एवं प्रतिष्ठा वाचक धातु रूप 'तल' से ताल शब्द की उत्पत्ति हुई। कुछ लोग मानते हैं कि तांडव नृत्य के ता और लास्य के ल के संयोग से ताल शब्द बना । कह सकते हैं कि शिव और शक्ति के योग से ताल बना इसीलिए संगीत के अखंड काल को नापने और विभाजित करने में सक्षम है। ताल स्वरों को और नृत्य को एक निश्चित नियम में बांध कर एक गति प्रदान करता है जिससे संगीत में अनुशासन आ जाता है । तालों को बजाने के लिए ही वाद्यों की आवश्यकता महसूस हुई इसीलिए ताल वाद्यों का आविष्कार हुआ । कहते ही हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है। समय के साथ साथ विभिन्न प्रकार के वाद्य विकसित हुए जिन्हें चार वर्गों में बांटा।
1- सुषिर वाद्य जिनमें स्वर की उत्पत्ति वायु या फूँक से होती है जैसे हारमोनियम,माउथऑर्गन आदि।
२ - तत् वाद्य जिनमें स्वरोत्पत्ति तार , रेशम या ताँत से होती है जैसे सितार, सन्तूर, सारंगी आदि।
३- घन वाद्य जिनमें लकड़ी या किसी वस्तु के आघात से आवाज़ निकलती है जैसे जलतरंग काष्ट तरंग आदि।
४- अवनद्ध वाद्य सबसे महत्वपूर्ण है । अन्य वाद्य स्वर वाद्य हैं किन्तु ये ताल वाद्य हैं । इनके ऊपर चमड़ा मढ़ा होता है और ये हाथ या लकड़ी से बजाये जाते हैं जैसे तबला, मृदंग, ढोल आदि। गायन और नृत्य में इन अवनद्ध वाद्यों का सबसे ज्यादा महत्व है क्योंकि इनकी संगत के बिना गायन और नृत्य अपनी पूर्णता को नहीं प्राप्त करते । रंजकता अपने उत्कर्ष पर नहीं पहुँच सकती इनके अभाव में ।
संगीत का सबसे आवश्यक अंग है लय । लय नहीं तो संगीत नहीं ,या यूँ भी कह सकते हैं की लय नहीं तो जीवन नहीं क्यों कि हम सांस भी एक लय में ही लेते हैं । जहाँ साँसों की लय बिगड़ी जीवन अवरूद्ध हो जाता है उसी प्रकार गायन ,वादन और नृत्य तीनों में ही जहाँ लय टूटी या बिगड़ी उसका सौंदर्य समाप्त हो जाता है। बिना लय के संगीत मृतप्राय हो जाता है ।
संगीत के तीनों आधार- गायन, वादन और नृत्य- संगीत के मूल तत्व स्वर और लय पर निर्भर होते हैं। अब गायन तथा नृत्य ये दोनों माध्यम ऐसे हैं जो बिना किसी वादन की सहायता से रंजकता पैदा कर ही नहीं सकते और संगीत का सबसे बड़ा गुण रंजकता प्रदान करना ही है। इसके अभाव में गायन एवं नृत्य दोनों ही कलाएं शून्य हो जाती हैं विशेष कर नृत्य की तो गायन एवं वादन दोनों पर ही निर्भरता है ।इसलिए इन दोनों ही कलाओं की प्रस्तुति के लिए स्वर वाद्य एवं ताल वाद्य की आवश्यकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। संगीतज्ञ एवं नर्तक अपनी कला से दर्शकों एवं श्रोताओं को रस की अनुभूति करा कर मंत्रमुग्ध कर सकें इसके लिये वाद्यों की नितांत आवश्यकता होती है।
निष्कर्ष यही निकलता है कि चूंकि गायन वादन और नृत्य का आधार स्तंभ स्वर, लय और ताल है इसलिये तीनों को ही एक दूसरे की आवश्यकता होती है, तीनों ही एक दूसरे के पूरक हैं।
मंजु श्रीवास्तव'मन'
वर्जीनिया , अमेरिका
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